Thursday, July 2, 2020

(1) भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए (कुछ यादें कुछ पुराने) पार्ट-१-सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

तोड़ती पत्थर / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

महिला सशक्तिकरण और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की 'वह तोड़ती पत्थर'


धैर्य, सहनशीलता, स्नेह, ममता, वात्सल्य, परिश्रम जैसे कई गुण हैं जो एक स्त्री की विशेषता हैं और इन विशेषताओं को कई कवियों ने कलमबंद किया है। इसी संदर्भ में निराली जी की यह कविता अत्यंत सुंदर है। 

वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार...

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप...

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन, 
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार...

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर...

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
"मैं तोड़ती पत्थर।"

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